'महाराज' के लिए अवॉर्ड्स में मिली ब्रेकथ्रू परफॉर्मेंस जीत के बाद शालिनी पांडे अपनी कलात्मक यात्रा को और निखारती दिख रही हैं। वे अब ऐसे किरदार चुन रही हैं जिनमें चीखने की नहीं, महसूस करने की ताकत चाहिए। हर नया प्रोजेक्ट जैसे किसी राग में जुड़ता एक ताज़ा सुर लगता है और बैंडवाले में उन्हें अब तक का सबसे सुरीला मोड़ मिला है।
'डब्बा कार्टेल' की खामोश जुझारू छवि से लेकर 'राहु केतु' की अनपेक्षित हास्य सहजता तक, उनकी पसंद साफ बताती है कि वे गहराई और विस्तार की तलाश में हैं। बैंडवाले वह मुकाम बनता है जहां यह तलाश अपना ठिकाना पा लेती है।
निर्देशक अक्षत वर्मा और सह-निर्माता स्वानंद किरकिरे व अंकुर तिवारी की यह आठ कड़ियों वाली शृंखला मरियम की कहानी कहती है, जो भारतीय समाज की बेटियों के लिए तय सबसे सुरक्षित जाल से निकलना चाहती है — कम उम्र में सम्मानजनक शादी। रतलाम की शांत बंदिशों के बीच बसी यह कहानी एक सच्चाई समझती है — छोटे शहरों में सपने धमाके से नहीं फूटते, वे धीरे-धीरे रिसते हैं।
मरियम के रूप में शालिनी पूरे संयम के साथ कहानी का भार संभालती हैं। वह कोई आग उगलती बागी नहीं, बल्कि वह आज्ञाकारी बेटी है जिसे महत्वाकांक्षा के लिए माफी मांगना सिखाया गया है। कविता उसका निजी विद्रोह बनती है और गुमनामी उसकी ढाल। उसकी चाहत शोर नहीं मचाती, पर लगातार धड़कती रहती है और यही निरंतरता किरदार को सच्चाई की चुभन देती है।
अधिकतम स्क्रीन टाइम और भावनाओं की परतों से भरे किरदार में शालिनी ऐसा अभिनय देती हैं जो ध्यान मांगता नहीं, खुद-ब-खुद खींच लेता है। घर की सुरक्षा में कतर दिए गए पंखों वाली स्त्री के रूप में वे पूरी तरह विश्वसनीय लगती हैं। आजादी का स्वाद चखने की उसकी तड़प उसे बैंडवाले की सबसे जमीनी और मानवीय उपस्थिति बना देती है। बिना भारी-भरकम संवादों और बिना नाटकीय इशारों के, वे मुख्यधारा के ढर्रे छोड़कर आत्मीय भावनात्मक गहराई को अपनाती हैं और शो की भावनात्मक धुरी बनकर उभरती हैं।
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