निर्देशक, लेखिका और क्रिएटर स्वप्ना जोशी, जिन्होंने कुटुंब, कलश, इंडिया कॉलिंग और रंग बदलती ओढ़नी जैसे लोकप्रिय टीवी शो का निर्देशन किया है, अब अपने करियर के नए अध्याय की शुरुआत कर रही हैं। उन्होंने हाल ही में पपराज़ी एंटरटेनमेंट में क्रिएटिव डायरेक्टर के रूप में कार्यभार संभाला है।
तीन दशकों से अधिक के टीवी और फ़िल्मी अनुभव के साथ, स्वप्ना ने हिंदी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी भाषाओं में कई धारावाहिकों और एपिसोड्स का निर्देशन व निर्माण किया है। 1987 में अहमदाबाद दूरदर्शन में प्रोडक्शन असिस्टेंट के रूप में अपने सफर की शुरुआत करने वाली स्वप्ना ने स्टार प्लस, सोनी और ज़ी टीवी जैसे प्रमुख चैनलों के लिए शो बनाए और अपनी रचनात्मकता से इंडस्ट्री में खास पहचान बनाई।
स्वप्ना कहती हैं, “तीन दशकों से अधिक समय तक टीवी और फ़िल्मों में काम करने के बाद, अब मुझे लगता है कि एक नए अध्याय में कदम रखने का समय है, जहाँ क्रिएटिविटी और टेक्नोलॉजी साथ आएं। पपराज़ी एंटरटेनमेंट से जुड़ना मुझे इसलिए उत्साहित करता है क्योंकि यह ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ रियल और एआई कंटेंट का संगम होता है और जहाँ युवा, ऊर्जावान दिमाग़ लगातार सीमाओं को तोड़ते रहते हैं। मैं अपनी स्टोरीटेलिंग का अनुभव साझा करने के साथ-साथ इस नई पीढ़ी के ताज़ा दृष्टिकोण से भी सीखना चाहती हूँ।”
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें शो बनाने में सबसे ज़्यादा आनंद क्यों आता है, तो स्वप्ना कहती हैं, “कहानियाँ कहना हमेशा मेरा पैशन रहा है। मेरा मानना है कि हर शो एक नई दुनिया है जिसे खोजा जाना बाकी है। दर्शकों से जुड़ने, भावनाएँ जगाने और समाज की बदलती सोच को कहानियों के माध्यम से दर्शाने की क्षमता मेरे लिए बेहद संतोषजनक है। हर शो मुझे कुछ नया और ताज़ा देने की चुनौती देता है, चाहे वह एक जटिल पारिवारिक ड्रामा हो या सामाजिक संदेश से जुड़ी मनोरंजक कहानी।”
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अपने लंबे अनुभव से मिली सीख पर स्वप्ना कहती हैं, “सबसे बड़ा सबक है अनुकूलन (adaptability)। इंडस्ट्री हमेशा बदलती रहती है — ट्रेंड्स, दर्शकों की अपेक्षाएँ और टेक्नोलॉजी लगातार बदलती रहती हैं। लेकिन स्टोरीटेलिंग का मूल हमेशा मज़बूत किरदारों, संघर्ष और समाधान में रहता है। मैंने सीखा है कि हमेशा खुले दिमाग़ से काम करना चाहिए, धैर्य रखना चाहिए और सीखते रहना चाहिए।”
अपने करियर की सबसे बड़ी चुनौती पर वह कहती हैं, “अक्सर सबसे कठिन काम था प्रभावशाली और सार्थक कहानियाँ कहने और साथ ही उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने का संतुलन बनाना। टीआरपी की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए कहानियों को रोचक बनाए रखना, रचनात्मक समस्याओं का हल ढूँढना और कभी-कभी कठिन निर्णय लेना पड़ा। लेकिन इससे मैंने धैर्य, दृढ़ता और यह सीखा कि कहानी के प्रति सच्चे रहते हुए भी मनोरंजन के व्यवसायिक पक्ष को समझना उतना ही ज़रूरी है।”
मनोरंजन उद्योग के बदलते स्वरूप पर वह कहती हैं, “दूरदर्शन से लेकर ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स तक का सफर बहुत बड़ा बदलाव रहा है। आज स्टोरीटेलिंग पारंपरिक फ़ॉर्मैट्स तक सीमित नहीं है। अब प्रयोग करने की ज़्यादा गुंजाइश है, वैश्विक थीम्स और अलग-अलग तरह की कहानियों के लिए जगह है। टेक्नोलॉजी ने हमें बड़ा सोचने और उन विचारों को साकार करने का मौका दिया है, जिनके बारे में पहले सोचना भी मुश्किल था।”
