शब्दों के खेल के बहाने समाज को आईना दिखाती है फिल्म तुझ्या आयला

    मराठी सिनेमा लगातार ऐसे विषयों को पर्दे पर लाने के लिए जाना जाता है, जो मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करते हैं। निर्देशक सुजय डहाके की आने वाली फिल्म ‘तुझ्या आयला’ भी इसी दिशा में एक अलग और दिलचस्प प्रयास नजर आती है। फिल्म का सबसे पहला आकर्षण इसका नाम है, जो सुनते ही दर्शकों के मन में सवाल खड़ा करता है। लेकिन फिल्म का कॉन्सेप्ट केवल एक आपत्तिजनक लगने वाले शब्द तक सीमित नहीं है, बल्कि शब्दों के इस्तेमाल, उनके असर और समाज में उनकी स्वीकार्यता को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।


    कहानी एक ऐसे शहरी लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है, जो महाराष्ट्र के एक गांव में पहुंचता है और वहां की एक खास तरह की मौखिक भिड़ंत या शब्दों के खेल से रूबरू होता है। देखते ही देखते यह खेल उसके लिए एक चुनौती बन जाता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह महज शब्दों की बाजीगरी न रहकर इंसानी व्यवहार, अहंकार और आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा बनती दिखाई देती है।


    फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका विषय चुनने का साहस है। जिस शब्द को आम बातचीत में अक्सर गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, उसी को फिल्म ने एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखने की कोशिश की है। ट्रेलर से यह संकेत मिलता है कि फिल्म दर्शकों से यह सवाल भी करती है कि हम किसी शब्द को बोलते समय उसके अर्थ और उसके सामने वाले व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में कितना सोचते हैं।


    निर्देशक सुजय डहाके की फिल्म को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता इसी वजह से है कि उन्होंने कहानी को सिर्फ सतही मनोरंजन बनाने के बजाय उसके पीछे एक विचार रखने की कोशिश की है। फिल्म में राजश्री देशपांडे, रोहिणी हट्टंगडी और संभाजी भगत जैसे कलाकारों की मौजूदगी भी इसकी गंभीरता बढ़ाती है।

    फिल्म का ग्रामीण परिवेश और बच्चों के खेल से जुड़ी यादें भी कहानी को एक अलग रंग देते हैं। ‘बागड बागड’ जैसे गीत के जरिए बचपन और खेल की दुनिया को कहानी से जोड़ने की कोशिश की गई है।
    कुल मिलाकर, ‘तुझ्या आयला’ सिर्फ अपने अनोखे नाम की वजह से चर्चा में आने वाली फिल्म नहीं लगती, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा विचार नजर आता है जो दर्शकों को हंसाने, चौंकाने और अंत में सोचने पर मजबूर कर सकता है। फिल्म की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सुजय डहाके इस अनोखे कॉन्सेप्ट को पूरी फिल्म में कितनी मजबूती और संवेदनशीलता के साथ निभा पाते हैं। हम इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार देते हैं। फिल्म का निर्माण कुमार मंगत पाठक, अभिषेक पाठक, मुरलीधर छत्वानी, आदित्य जोशी, सुनील जैन और राजेश सिंह ने मिलकर किया है।
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