मुंबई। अभिनेत्री से समाजसेवी बनीं सोमी अली ने घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता को केवल अभियान तक सीमित रखने के बजाय पीड़ितों को वास्तविक सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। अमेरिका स्थित गैर-सरकारी संगठन ‘नो मोर टियर्स’ की संस्थापक सोमी अली वर्षों से घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और उत्पीड़न की शिकार महिलाओं व अन्य पीड़ितों की मदद कर रही हैं। अक्टूबर को घरेलू हिंसा जागरूकता माह के रूप में मनाए जाने के बीच उन्होंने कहा कि पीड़ितों की सहायता के लिए साल के सभी 12 महीने प्रयास किए जाने चाहिए।
सोमी अली ने बताया कि उनके संगठन को प्रतिदिन करीब 30 फोन आते हैं। इनमें बड़ी संख्या घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों की होती है। संगठन सप्ताह के सातों दिन, छुट्टियों में भी काम करता है और घरेलू हिंसा के अलावा मानव तस्करी, आव्रजन संबंधी समस्याओं तथा अन्य प्रकार के उत्पीड़न के मामलों में सहायता करता है। उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा किसी एक महीने तक सीमित नहीं रहती, इसलिए पीड़ितों की मदद भी किसी अभियान की अवधि तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
सोमी के अनुसार, जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन इससे पीड़ितों की समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर संदेश साझा करना या जागरूकता का प्रतीक पहनना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक मदद तब होती है, जब किसी पीड़ित को सुरक्षित आश्रय, कानूनी सहायता, रहने के लिए घर और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के अवसर मिलते हैं। उनके मुताबिक, यदि जागरूकता माह समाप्त होने के बाद भी किसी पीड़ित को घर का किराया देने या सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने में मदद नहीं मिलती, तो अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए सोमी ने बताया कि बचपन में झेली गई चुप्पी और प्रवासी महिलाओं की मुश्किलों ने उन्हें ‘नो मोर टियर्स’ शुरू करने के लिए प्रेरित किया। कई महिलाओं के पास ऐसी जगह नहीं होती, जहां उनकी भाषा, आव्रजन स्थिति और अपने देश वापस भेजे जाने के डर को समझते हुए उनकी मदद की जा सके। संगठन अब तक हजारों मामलों में सहायता कर चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर मामले में आवास उपलब्ध कराना संभव नहीं होता, क्योंकि पीड़ितों की जरूरत के अनुसार कानूनी मदद, आव्रजन संबंधी सहायता, मानसिक परामर्श, रोजगार या अन्य संस्थाओं से संपर्क कराने की जरूरत भी पड़ सकती है।
संगठन ने मानव तस्करी के मामलों में भी पीड़ितों की मदद की है। सोमी ने बताया कि कुछ युवतियों को मसाज पार्लर के माध्यम से तस्करी का शिकार बनाया गया। ऐसी परिस्थितियों से बाहर निकलने के बाद भी कई पीड़ितों को अपने परिवारों और समाज के विरोध का सामना करना पड़ता है। सामाजिक कलंक और परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी धारणाएं उनके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर देती हैं। सोमी का कहना है कि परिवार का सम्मान पीड़ित को स्वीकार करने और उसकी बात पर विश्वास करने में है, न कि अपराध करने वाले को बचाने के लिए चुप्पी बनाए रखने में।
उन्होंने दो मामलों का उल्लेख करते हुए बताया कि पीड़ितों को केवल तत्काल संकट से निकालना ही पर्याप्त नहीं होता। एक मामले में बांग्लादेश की युवती को मंगेतर के वीजा पर अमेरिका लाया गया था, जहां शादी के बाद उसे गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। संगठन ने उसे आश्रय, मानसिक परामर्श, कानूनी सहायता, रोजगार और वाहन चलाने का प्रशिक्षण दिलाने में मदद की। एक दानदाता ने उसे कार भी उपलब्ध कराई। बाद में युवती ने तलाक लेकर अपनी जिंदगी दोबारा व्यवस्थित की और मां बनी।
एक अन्य मामले में मुंबई के एक युवक को परिवार के सामने अपनी यौन पहचान जाहिर करने के बाद हिंसा का सामना करना पड़ा। स्थिति बिगड़ने और जान को खतरा होने पर संगठन ने उसे अमेरिका पहुंचने में मदद की। वहां उसे शरण संबंधी प्रक्रिया, मानसिक परामर्श, शिक्षा और सुरक्षित आवास के लिए सहायता मिली। सोमी के अनुसार, इन मामलों से पता चलता है कि पीड़ितों को नया जीवन शुरू करने के लिए लंबे समय तक सहयोग की जरूरत होती है।
सोमी अली ने कहा कि घरेलू हिंसा किसी एक आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं है। आर्थिक स्थिति के अनुसार उत्पीड़न के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन डर और नियंत्रण का अनुभव पीड़ितों के लिए समान रूप से गंभीर होता है। उन्होंने कहा कि संपन्न परिवारों में प्रतिष्ठा, कानूनी दबाव, फोन की निगरानी या बच्चों के माध्यम से नियंत्रण किया जा सकता है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के पास सुरक्षित स्थान और संसाधनों की कमी हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में पीड़ित को सहायता की जरूरत होती है।
उनका मानना है कि घरेलू हिंसा रोकने के लिए पीड़ितों के लिए अपमानजनक रिश्तों से बाहर निकलने की राह आसान बनानी होगी। इसके साथ ही युवकों को स्वस्थ रिश्तों और सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना, लड़कियों को चुप्पी को वफादारी न समझने के लिए जागरूक करना तथा हिंसक व्यवहार को सामाजिक स्वीकृति देने वाली सोच को बदलना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि पीड़ित की पहली शिकायत को गंभीरता से सुना जाना चाहिए, क्योंकि कई महिलाएं अपनी तकलीफ को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के बजाय कम करके बताती हैं।
सोमी के अनुसार, किसी पीड़ित को बचाना केवल पहला कदम है। उसके जीवन को दोबारा पटरी पर लाने के लिए मानसिक परामर्श, रोजगार, सुरक्षित आवास, आर्थिक सहयोग और लंबे समय तक साथ देने की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि अक्टूबर घरेलू हिंसा पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का अवसर है, लेकिन असली परीक्षा साल के बाकी महीनों में होती है। जागरूकता तभी सार्थक है, जब पीड़ितों को संकट के समय और उसके बाद भी लगातार मदद मिलती रहे।
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