एआई से अभिनय निखरे, पहचान की नकल नहीं होनी चाहिए : अमल सहरावत
मुंबई। टेलीविजन और डिजिटल माध्यम में काम कर चुके अभिनेता अमल सहरावत का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच कलाकार की सहमति और उसकी डिजिटल पहचान का सवाल पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। ‘छोटी सरदारनी’ में जग्गा और ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में संग्राम सिंह की भूमिका निभा चुके अमल डिजिटल परियोजनाओं में भी काम कर चुके हैं।
डीपफेक को लेकर बढ़ती चिंता पर अमल ने कहा कि तकनीक ने किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और हावभाव को दोबारा तैयार करना बेहद आसान बना दिया है। उनके अनुसार अभिनेता का चेहरा, आवाज और अभिनय उसकी पेशेवर पहचान का हिस्सा है। पहले किसी की तस्वीर या वीडियो को विश्वसनीय तरीके से बदलने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता जरूरी होती थी, लेकिन अब यह काम काफी आसानी से किया जा सकता है। ऐसे में किसी कलाकार की पहचान का बिना जानकारी या अनुमति इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है।
अमल के मुताबिक डीपफेक के दौर ने कलाकारों के लिए अपनी डिजिटल मौजूदगी को लेकर भी सतर्कता बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि अभिनेता वर्षों की मेहनत से दर्शकों के साथ भरोसे का रिश्ता बनाते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनके चेहरे और आवाज का इस्तेमाल कर उन्हें ऐसा कुछ कहते या करते हुए दिखा दे, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, तो इससे यह भरोसा प्रभावित हो सकता है। हालांकि वह डर के कारण सोशल मीडिया से दूरी बनाने के बजाय लोगों में जागरूकता बढ़ाने को इसका बेहतर रास्ता मानते हैं।
अभिनेता का कहना है कि एआई तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है। फिल्म निर्माण, दृश्य प्रभाव और कहानी कहने के क्षेत्र में इसके जरिए कई नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। लेकिन किसी कलाकार के चेहरे, आवाज या पहचान का इस्तेमाल उसकी जानकारी और अनुमति के बिना नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार तकनीक चाहे नई हो, लेकिन मूल सिद्धांत स्पष्ट है कि किसी की पहचान का इस्तेमाल उसकी सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।
अमल ने कहा कि एआई से तैयार सामग्री और पुराने तरीके से तस्वीरों में की जाने वाली छेड़छाड़ में सबसे बड़ा अंतर उसकी वास्तविकता जैसी दिखने वाली प्रस्तुति है। पहले तस्वीर में बदलाव या किसी बयान को संदर्भ से अलग करने के बावजूद वास्तविकता और छेड़छाड़ के बीच कुछ अंतर नजर आता था। अब एआई की मदद से किसी व्यक्ति को उसकी ही आवाज में ऐसी बात कहते हुए दिखाया जा सकता है, जो उसने कभी कही ही नहीं। ऐसे में कलाकार के लिए मामला केवल तस्वीर की सुरक्षा का नहीं, बल्कि उसकी पूरी पहचान और अभिनय की सुरक्षा का बन जाता है।
उन्होंने कहा कि फर्जी सामग्री के प्रसार की जिम्मेदारी केवल उसे बनाने वाले व्यक्ति की नहीं हो सकती। सामग्री तैयार करने वालों के साथ डिजिटल मंचों और दर्शकों की भी जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक मंचों को शिकायत मिलने पर ऐसी सामग्री के खिलाफ तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए, जबकि लोगों को भी किसी वीडियो या तस्वीर को केवल वास्तविक दिखने के आधार पर आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।
अमल ने दर्शकों से अपील की कि किसी चर्चित या चौंकाने वाले वीडियो को देखने के बाद तुरंत विश्वास या साझा करने के बजाय उसके स्रोत की जांच करें। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय माध्यम से उसकी पुष्टि होने के बाद ही उसे सही मानना चाहिए। एक व्यक्ति द्वारा किया गया साझा करना छोटा कदम लग सकता है, लेकिन जब लाखों लोग किसी फर्जी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं तो वह लोगों के बीच सच के रूप में स्थापित हो सकती है।
फिल्म निर्माण में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अमल उत्साहित भी हैं। उनका कहना है कि कैमरा, ध्वनि, दृश्य प्रभाव और डिजिटल तकनीक की तरह एआई भी सिनेमा में बदलाव ला सकता है और कलाकार नई तकनीक के साथ खुद को ढाल सकते हैं। हालांकि, तकनीक का इस्तेमाल किसी कलाकार के अभिनय को बेहतर बनाने और उसकी पहचान को बिना अनुमति दोहराने के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
अमल के अनुसार इस पूरे विषय में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘सहमति’ है। यदि कोई कलाकार अपनी आवाज, चेहरा या अभिनय के इस्तेमाल की अनुमति देता है तो यह रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन उसकी जानकारी के बिना ऐसा किया जाता है तो यह उसकी पहचान और अधिकारों से जुड़ा मामला बन जाता है। उनका मानना है कि एआई कलाकारों के लिए रचनात्मक संभावनाएं बढ़ाए, न कि उन्हें अपनी ही पहचान के इस्तेमाल का अधिकार खोने की स्थिति में पहुंचाए।
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